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हदीस न. [1408]: अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है,  उन्होंने कहा, एक बार रसूलुल्लाह सलल्‍्लल्लाहु अलैहि वसललम से कहा गया कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! (अल्लाह के यहां) लोगों में किसका मर्तबा ज्यादा है? आपने फरमाया, जो उन सब में अल्लाह का खौफ ज्यादा रखता हो। लोगों ने अर्ज किया कि हम यह बात नहीं पूछ रहे हैं। आपने फरमाया (तो सबसे ज्यादा बुजुर्ग) युसूफ पैगम्बर हैं जो खुद नबी थे, बाप नबी, दादा नबी, परदादा नबी, अल्लाह के खलील। लोगों ने कहा, हम यह बात भी नहीं पूछते। आपने फरमाया कि खानदान अरब की बाबत पूछते हो? उन सब में से जो ज्यादा जाहिलियत में बेहतर था वही इस्लाम में भी बेहतर है। बशर्ते कि वो दीन का इल्म हासिल रखता हो।   

 

फायदे: शराफत की दर्जा बन्दी बायस तौर पर है कि जो दौरे जाहिलियत में शरीफ था और इस्लाम लाने के बाद भी उसने शराफत को दागदार नहीं किया, वो अल्लाह के यहां अच्छा मुकाम रखता है। अगर इसके साथ दीनी बसीरत भी शामिल हो जाये तो उसका मुकाम तो बहुत ही ऊंचा है। अलबत्ता बेदीनी की सूरत में शराफत का कोई मुकाम नहीं है।

हदीस न. [1409]: समरा रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसलल्‍लम ने फरमाया, आज रात ख्वाब में मेरे पास दों आदमी आये और मुझे अपने साथ ले गये। फिर हम एक लम्बे कद के शख्स के पास पहुंचे। उसके दराज कद होने की वजह से हम उसका सर नहीं देख सके थे और वो इब्राहिम अलैहि. थे।  

फायदे: हजरत इब्राहिम अलैहि. के लम्बे कद वाले होने से मुराद उनका आली मर्तबा होना है। अगली हदीस से मालूम होता है कि रसूलुल्लाह सल्‍लल्लाहु अलैहि वसललम शकक्‍लो सूरत और अख्लाक व सीरत में हजरत इब्राहिम के जैसे थे। (औनुलबारी 4/96)

हदीस न. [1410]: इब्ने अब्बास रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा रसूलुल्लाह सल्‍लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फरमाया, अगर तुम इब्राहिम अलैहि. को देखना चाहते हो तो अपने साहब यानी मेरी तरफ देख लो। रहे मूसा अलैहि. तो वो गठे हुए जिस्म थे वाले गन्दमी रंग के आदमी थे। सुर्ख ऊंट पर सवार थे। जिसकी नुकैल खजूर के पत्तो की बनी हुई रस्सी की थी। जैसे मैं उनकी तरफ देख रहा हूं कि शी नशीबी इलाके में उतर रहे हैं।

हदीस न. [1411]: अबू हुरैरा रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा, रसूलुल्लाह सल्‍लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फरमाया, इब्राहिम अलैहि. ने अपना खतना खुद एक बसोले (लकड़ी छिलने का औजार) से किया  था। जबकि वो अस्सी बरस के थे।   

 

फायदे: दूसरी रिवायत में है कि खत्ना करने से जब इब्राहिम अलैहि. को तकलीफ होती तो इसका इजहार किया। फिर अल्लाह से गोया हुए कि इलाही तेरे हुक्म में देर करना मुझे नापसन्द था। इसलिए हुक्म को पूरा करने में जल्दी की है। (औनुलबारी 4/97)


हदीस न. [1412]: अबू हुरैरा रजि. से ही दूसरी रिवायत लफ्जे कुदूम दाल की तख्फीफ (बगैर तशदीद) के आया है ।  

 

फायदे: मुस्लिम की जुमला रियायत में यह लफ्ज तखफीक के साथ है, जिसका मायना बसूला है। अलबत्ता तशदीक के साथ यह लफ्ज दो मायनों में इस्तेमाल होना है। एक मुकाम का नाम और राजिह बात यही है कि दोनों सूरतों में आला का नाम है। (औनुलबारी 4/91)


हदीस न. [1413]: अबू हुरैरा रजि. से ही रिवायत है, उन्होंने कहा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि इब्राहिम अलैहि. ने तीन बार के अलावा कभी तौरया (हकीकत के खिलाफ बात कहना) नहीं किया। उनका यह कहना कि मैं बीमार हूं और दूसरा यह कहना कि उन बूतों में से बड़े बूत ने यह काम किया है (यह दोनों तो अल्लाह के लिए थे) फिर आपने फरमाया, तीसरा उस वक्‍त जबकि इब्राहिम अलैहि और साराह अलैहि. दोनों मियां बीवी जा रहे थे कि उनका एक जालिम बादशाह की तरफ से गुजर हुआ। उस बादशाह से कहा गया कि यहां एक आदमी आया है और उसके साथ एक खुबसूरत औरत है। चूनांचे उस बादशाह ने उनके पास एक आदमी भेजा और साराह के बारे में पूछा कि वो कौन है? इब्राहिम अलेहि. ने जवाब दिया कि यह मेरी बहन है। इसके बाद आप साराह के पास तशरीफ ले गये। फिर उन्होंने बाकी हदीस (1043) बयान की' जो पहले गुजर चुकी है।  

 

फायदे: मालूम हुआ कि दीनी मकसद के लिए बतौरे तआरीज (इशारा) व इलजाम ऐसी गुफ्तगु करना जो बजाहिरे खिलाफ वाक्या हो, ऐसा झूट नहीं जिस पर फटकार आई है, ऐसा करना न सिर्फ जाइज है, बल्कि बाज औकात जरूरी होता है।


हदीस न. [1414]:  उम्मे शरीक रजि. से रिवायत कि नबी सलल्‍्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने गिरगिट को मार डालने का हुक्म दिया। यह हदीस पहले गुजर चुकी है। लेकिन  यहां इतना ज्यादा है कि वो इब्राहिम " अलैहि. पर फूंक से आग तेज करता था।  

 

फायदे: गिरगिट की खासियत में तकलीफ पहुंचाना शामिल है और उसकी यह फितरत हजरत इब्राहिम अलैहि. के उस वाक्ये में बिल्कुल नुमाया हो चुकी थी। इसलिए इस्लामी कानून में उसे मार देने का हुक्म हे।  नोट : यह हदीस बुखारी में पहले (3307) गुजर चुकी है, लेकिन तहरीद में पहली दफा आई है, मुसन्निफ (लेखक) का पहले गुजर जाने का हवाला लिखने वाले की गलती मालूम होती है।

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